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Korba News : जिला अस्पताल के इंटर्न डॉक्टर हड़ताल पर, OPD और वार्ड सेवाएं प्रभावित; ₹30 हजार स्टाइपेंड की मांग

Korba News : कोरबा। कोरबा जिला अस्पताल में इंटर्न डॉक्टरों के हड़ताल पर चले जाने से स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ना शुरू हो गया है। स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर इंटर्न डॉक्टरों ने काम बंद कर दिया है। डॉक्टरों की प्रमुख मांग है कि उनका मासिक स्टाइपेंड बढ़ाकर 30 हजार रुपये किया जाए। इंटर्न डॉक्टरों के काम से दूर रहने के कारण अस्पताल की OPD और वार्ड सेवाओं में मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन

इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि वे अस्पताल में मरीजों की सेवा के साथ-साथ अपनी व्यावहारिक चिकित्सा प्रशिक्षण की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। इसके बावजूद उन्हें मिलने वाला वर्तमान स्टाइपेंड उनकी जरूरतों के लिहाज से पर्याप्त नहीं है।

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इसी मांग को लेकर इंटर्न डॉक्टरों ने सामूहिक रूप से काम बंद करने का फैसला लिया है। उनका कहना है कि जब तक स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रह सकता है।

₹30 हजार मासिक स्टाइपेंड की मांग

इंटर्न डॉक्टरों ने अपना मासिक स्टाइपेंड बढ़ाकर 30,000 रुपये किए जाने की मांग रखी है। उनका कहना है कि इंटर्नशिप के दौरान अस्पताल में नियमित रूप से ड्यूटी करनी पड़ती है। मरीजों की देखभाल, वार्ड ड्यूटी और अन्य चिकित्सकीय जिम्मेदारियों के बावजूद वर्तमान स्टाइपेंड अपेक्षाकृत कम है।

डॉक्टरों का कहना है कि उनकी मांग लंबे समय से चली आ रही है और अब इसे लेकर उन्होंने काम बंद कर अपनी बात शासन और अस्पताल प्रबंधन तक पहुंचाई है।

OPD और वार्ड सेवाओं पर असर

इंटर्न डॉक्टरों की हड़ताल का सीधा असर अस्पताल की रोजमर्रा की सेवाओं पर पड़ रहा है। OPD में मरीजों की संख्या अधिक होने की स्थिति में डॉक्टरों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा वार्ड में भर्ती मरीजों की नियमित देखभाल और अन्य कार्यों पर भी असर पड़ने की संभावना है।

अस्पताल प्रबंधन की ओर से उपलब्ध डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के माध्यम से सेवाओं को सामान्य बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि मरीजों को ज्यादा परेशानी न हो।

इंटर्न डॉक्टरों के काम बंद करने के बाद जिला अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ गई है। मरीजों को इलाज के लिए अस्पताल में इंतजार करना पड़ सकता है। वहीं गंभीर मरीजों की सेवाओं को प्राथमिकता देने की आवश्यकता भी बढ़ गई है।

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