रिटायरमेंट की सबसे बड़ी चूक: देर से बचत और “लंबा काम” करने की सोच लाखों भारतीयों को बना रही है असुरक्षित: प्रीति अग्रवाल

गुरुग्राम के राजेश की कहानी जैसी सोच भारत में लाखों लोगों में आम है—”अभी मैं स्वस्थ हूं, 65 तक काम करूंगा और रिटायरमेंट के लिए बचत कर लूंगा।” विशेषज्ञों का मानना है कि आज के दौर में सिर्फ लंबा काम करने की सोच बेहद जोखिम भरी है। स्वास्थ्य में अचानक गिरावट, आर्थिक मंदी, या कंपनी में छंटनी जैसी घटनाएं किसी भी वक्त रिटायरमेंट की योजना बिगाड़ सकती हैं, और यह भरोसा एक जुआ साबित हो सकता है.

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार भारतीयों को हृदय संबंधी रोग पश्चिमी देशों की तुलना में 10 वर्ष पहले हो जाते हैं। बीमा या सक्रिय वित्तीय योजना के बिना परिवार न सिर्फ जीवन की मुख्य जरूरतें, बल्कि अस्पताल के खर्चों से भी जूझ सकते हैं। वहीं, भारत में वृद्ध कर्मचारियों को लेकर कंपनियों का दृष्टिकोण भी अनुकूल नहीं—ज्यादातर भर्तियाँ युवा, तकनीकी रूप से दक्ष और कम वेतन वालों में होती हैं.

तीसरी बड़ी चुनौती है स्वास्थ्योपचार की महंगाई, जो वेतन वृद्धि से तेज़ गति से बढ़ रही है। एक सर्जरी की जो लागत आज ₹2 लाख है, वह अगले दस साल में ₹6 लाख तक पहुंच सकती है। भारत के परिवारों में बच्चों की शिक्षा, माता-पिता या वृद्धजन का खर्च भी अक्सर देर से नौकरी छोड़ने की सोच को असफल बना देता है। लगातार काम करना न सिर्फ मानसिक और शारीरिक थकावट लाता है, बल्कि उत्पादकता भी घटती है.

भारत में मजबूत सोशल सिक्योरिटी नेट के अभाव में रिटायरमेंट प्लानिंग का असल रास्ता है—समय रहते छोटी-छोटी बचत शुरू करना, निवेश में विविधता रखना और जोखिम व सुरक्षा का संतुलन साधना। 30 वर्ष की उम्र में ₹10,000/माह निवेश करने पर 60 वर्ष तक कॉर्पस ₹2 करोड़ बन जाता है, लेकिन 50 में शुरू करने पर मात्र ₹20 लाख मिलते हैं। इसलिए, जितनी जल्दी बचत शुरू करें, उतना फायदा.

वित्तीय विशेषज्ञों की राय में, बचत के साथ-साथ टर्म/हेल्थ इंश्योरेंस करवाना, हर 2–3 साल में रिटायरमेंट योजना की समीक्षा करना और आय के संपूरक स्रोत जैसे रेंटल, डिविडेंड या पार्ट-टाइम कंसल्टिंग बनाना बेहद जरूरी है। सभी संपत्तियां FD, गोल्ड तक सीमित न रखें, बल्कि इक्विटी, बॉन्ड, रियल एस्टेट आदि में डाइवर्सिफाई करें ताकि बढ़ती महंगाई और जोखिम का सही सामना कर सकें.

रिटायरमेंट के लिए सबसे अच्छी रणनीति है—जल्दी शुरू, नियमित निवेश, सुरक्षा-बढ़ोतरी का संतुलन और बीमा-समीक्षा को जीवनशैली का हिस्सा बनाना, ताकि आने वाले वर्षों में आत्मनिर्भरता और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित हो सके

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