डीएवी खरमोरा में किया गया वेद प्रचार सप्ताह का समापन
डीएवी मुख्यमंत्री पब्लिक स्कूल खरमोरा कोरबा में डीएवी मैनेजमेंट कमेटी के तत्वावधान में दिनांक 19 अगस्त से वेद प्रचार सप्ताह मनाया जा रहा था जिसका भव्य समापन पूर्णाहूति के साथ किया गया। इस समारोह में शिक्षकों तथा छात्रों ने हर्षोल्लास के साथ हिस्सा लेकर विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तुत किये। इस समारोह में शिक्षकों तथा छात्रों के द्वारा वैदिक मंत्र वैदिक प्रश्नोत्तरी, भाषण, हवन, कविता जीवनी, स्लोगन, सामाजिक नुक्कड़ नाटक,हवन तथा 108 बार गायत्री मंत्र तथा 11 बार
महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया गया। इस वेद प्रचार सप्ताह का मुख्य उद्देश्य छात्रों को वेदों से परिचित कराना, आर्य समाज के बौद्धिक तथा नैतिक नियमों से अवगत कराकर उनका दैनिक जीवन में उपयोग कराना है। इस समारोह में छात्रों को आर्य समाज तथा उनके द्वारा समाज सुधार के क्षेत्र में किए गए सभी कार्यों से अवगत कराया गया। इस समारोह की यज्ञशाला में प्राचार्य हेमन्तो मुखर्जी तथा सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं तथा छात्रों ने आहुति दी। हमारे भारतीय संस्कृति में वेदों का अत्यधिक महत्व तथा उपयोगिता है। वेद हमें भारतीय संस्कृति से जोड़ने के लिए सेतु का कार्य करते हैं। वेदों में मनुष्य की सभी कठिनाइयों का निवारण किया गया है। जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसका वर्णन वेदों में नहीं है चाहे वह शिक्षा से संबंधित हो, शासन से या स्वास्थ्य से सभी क्षेत्रों की जानकारी वेदों में उपलब्ध है यही कारण है कि महर्षि दयानंद जी ने वेदों की ओर लौटने का नारा दिया। ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद होने के साथ ही सनातन धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। सबसे प्राचीन ग्रंथ होने के बाद आज भी यह लिखित रूप में प्राप्त होता है। सभी वेदों की रचना वैदिक काल में की गई इसी कारण इन रचनाओं का नाम वेद रखा गया। वेदों को अपौरुषेय से माना जाता है। पुराणों के आधार पर वेदों की रचना स्वयं देवी सरस्वती द्वारा की गई है। वेदों में यज्ञ तथा हवन को आवश्यक बताया गया है इसके पीछे यह कारण दिया गया है कि हवन और यज्ञ के माध्यम से जो समिधा आहुति में डाली जाती है इसके कारण उस स्थान का वातावरण शुद्ध और आध्यात्मिक हो जाता है। आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने समाज में हो रही विसंगतियों के कारण किया था। जिस समय आर्य समाज की स्थापना हुई उस समय हमारे समाज में अनेक प्रकार की कुप्रथाएं प्रचलित थी जिसमें दहेज प्रथा सती प्रथा तथा महिलाओं को शिक्षा से वंचित करना आदि समस्याएं प्रमुख थी। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना इन समस्याओं से निपटने के लिए की थी। उनके प्रयासों का ही फल था कि आज महिलाएं भी शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी है। दहेज प्रथा भले ही आज कम या ज्यादा मात्रा में हो किंतु सती प्रथा का अंत पूर्ण रूप से हो गया है। हम सभी स्वामी दयानंद सरस्वती जी के इस कृत्य के लिए सदैव उनके ऋणी रहेंगे। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रंथ हिंदी भाषा में सन 1875 में लिखा। इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य सत्य को सत्य तथा मिथ्या को मिथ्या ही प्रतिपादन करना था। इसके साथ ही आर्य समाज के सिद्धांतों का प्रचार करना था। इस ग्रंथ में स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अनेक अंधविश्वासों और मतों का खंडन किया है। इसके साथ ही इस ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने वेदों के मतों को पुनः प्रकाश में लाने का कार्य किया। सत्यार्थ प्रकाश शब्द का शाब्दिक अर्थ है सत्य को प्रकाश में लाना और सचमुच ही स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से संपूर्ण संसार को सत्य की राह दिखाई। सत्यार्थ प्रकाश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना की अपनी रचना के समय था। सत्यार्थ प्रकाश युगों युगों तक संपूर्ण मानव जाति के मार्ग को आलोकित करता रहेगा। वेद प्रचार सप्ताह की समाप्ति पर प्राचार्य मुखर्जी ने छात्रों तथा शिक्षकों को इस कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु आभार व्यक्त किया तथा शिक्षकों एवं छात्रों के उज्जवल भविष्य की कामना की।









