मानिकपुर खदान विस्तार को लेकर भू-विस्थापितों का धरना, मुआवजा-रोजगार और पुनर्वास की मांग; 8 गांवों के ग्रामीण जुटे
कोरबा। मानिकपुर खदान विस्तार को लेकर 8 गांवों के भू-विस्थापित ग्रामीणों ने अपनी वर्षों पुरानी मांगों को लेकर GM कार्यालय के सामने धरना शुरू किया है। ग्रामीणों की प्रमुख मांगें मुआवजा, रोजगार, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) और प्रभावित परिवारों के अधिकारों से जुड़ी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई मामले दशकों से लंबित हैं और अब वे इनका ठोस एवं समयबद्ध समाधान चाहते हैं।
1963-64 से जुड़ा है जमीन अधिग्रहण का मामला
ग्रामीणों के अनुसार, 1963-64 में मानिकपुर क्षेत्र के अनेक किसानों की जमीन अधिग्रहित की गई थी। प्रभावित परिवारों का दावा है कि जमीन अधिग्रहण के बाद मुआवजा, विस्थापन और रोजगार से जुड़े कई मामलों का अब तक पूर्ण समाधान नहीं हुआ है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ वर्तमान खदान विस्तार का मुद्दा नहीं है, बल्कि कई परिवारों के लिए यह दशकों से लंबित अधिकारों का मामला है।
जिस जमीन से कोयला उत्पादन, उन्हीं परिवारों के अधिकार लंबित
धरने पर बैठे ग्रामीणों का मुख्य सवाल है कि जिस जमीन के आधार पर वर्षों से कोयला उत्पादन किया जा रहा है, उस जमीन के मूल प्रभावित परिवारों के लंबित अधिकारों का अब तक पूर्ण समाधान क्यों नहीं हुआ।
ग्रामीणों के मुताबिक, उन्होंने समय-समय पर SECL प्रबंधन और जिला प्रशासन को आवेदन एवं ज्ञापन सौंपकर अपनी समस्याएं रखी हैं। कलेक्टर, कोरबा को भी मांगों से अवगत कराया गया है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि अब तक ऐसा ठोस और समयबद्ध समाधान सामने नहीं आया है, जिससे उनका भरोसा पूरी तरह बहाल हो सके।
भू-विस्थापन के साथ आजीविका और सामाजिक व्यवस्था भी प्रभावित
ग्रामीणों का कहना है कि भू-विस्थापन सिर्फ जमीन चले जाने तक सीमित नहीं होता। जमीन के साथ परिवार की आजीविका, खेती, मकान, सामाजिक परिवेश और बच्चों के भविष्य पर भी असर पड़ता है। ऐसे में केवल मुआवजा पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोजगार, पुनर्वास और पुनर्स्थापन की व्यवस्था भी जरूरी है।
प्रभावित परिवारों के पात्र युवाओं को रोजगार की मांग
धरने पर बैठे परिवारों की प्रमुख मांगों में प्रभावित परिवारों के पात्र युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देना भी शामिल है। ग्रामीण चाहते हैं कि रोजगार से जुड़े मामलों में पात्रता के आधार पर प्रक्रिया स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध हो।
उनका कहना है कि वर्षों पहले जमीन गंवाने वाले परिवारों के लंबित रोजगार प्रकरणों का स्पष्ट निराकरण होना चाहिए।
निजी ठेका कंपनियों में रोजगार प्रक्रिया पर भी सवाल
ग्रामीणों ने निजी ठेका कंपनियों के माध्यम से चल रही रोजगार प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि स्थायी रोजगार के लंबित मामलों का समाधान किए बिना निजी ठेका कंपनियों के जरिए रोजगार देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह प्रक्रिया केवल दिखावे तक सीमित है और प्रभावित परिवारों के मूल रोजगार प्रकरणों पर अब तक स्पष्टता नहीं है। उन्होंने रोजगार प्रक्रिया को सार्वजनिक और पारदर्शी बनाने की मांग की है।
21 अगस्त की प्रस्तावित जनसुनवाई स्थगित होने का भी मुद्दा
ग्रामीणों के अनुसार, 21 अगस्त को प्रस्तावित पहली जनसुनवाई स्थगित होने के बाद प्रबंधन की ओर से मामले में अपेक्षित पहल नहीं हुई। उनका कहना है कि जनसुनवाई के स्थगित होने के बाद भी उनकी मांगों और समस्याओं के समाधान को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई।
इसी के बाद प्रभावित ग्रामीणों ने धरने के जरिए अपनी मांगों को फिर से प्रमुखता से उठाया है। ग्रामीण अब मुआवजा, रोजगार, पुनर्वास और पुनर्स्थापन से जुड़े लंबित मामलों पर ठोस निर्णय और समयबद्ध कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।









