चिप्स-कोल्ड ड्रिंक पर Warning Label का प्रस्ताव अटका, कंपनियों के विरोध के बाद सरकार ने बदला रुख

Warning Label’ नई दिल्ली। चिप्स, कोल्ड ड्रिंक और अन्य पैकेज्ड फूड में ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की जानकारी उपभोक्ताओं को आसानी से मिले, इसके लिए फ्रंट-ऑफ-पैक Warning Label लगाने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। मामला अब सरकार और खाद्य कंपनियों के बीच मतभेद का कारण बन गया है।

FSSAI ने Warning Label की जगह रखा दूसरा प्रस्ताव

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने सुप्रीम कोर्ट में दिए गए अपने हालिया रुख में सामने की तरफ सीधे चेतावनी चिह्न लगाने के बजाय पोषण संबंधी जानकारी वाली टेबल का प्रस्ताव रखा है। इसमें किसी उत्पाद में मौजूद अतिरिक्त चीनी, सैचुरेटेड फैट और नमक की मात्रा के साथ उनकी अनुशंसित दैनिक सीमा की जानकारी देने की बात कही गई है।

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इस व्यवस्था में उपभोक्ता को पैकेट पर दिए आंकड़ों को देखकर खुद समझना होगा कि किसी खाद्य पदार्थ में इन पोषक तत्वों की मात्रा कितनी अधिक है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि साधारण Warning Label उपभोक्ता को खरीदारी के समय तुरंत संकेत दे सकता है।

कंपनियों ने Warning Label पर जताई आपत्ति

इस प्रस्ताव को लेकर खाद्य और पेय उद्योग की कंपनियों ने आपत्ति जताई है। मार्च 2026 में हुई Stakeholder Consultation में उद्योग संगठनों ने Warning Label को भ्रम पैदा करने वाला और प्रभावशीलता के लिहाज से सवालों के घेरे में बताया था। कंपनियों की ओर से तर्क दिया गया कि केवल किसी प्रतीक या चेतावनी से उपभोक्ताओं की खान-पान की आदतों में जरूरी बदलाव नहीं आएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को लगाई फटकार

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI के रुख पर कड़ी नाराजगी जताई है। 13 अगस्त 2026 को सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि जब पैकेज्ड फूड में चीनी, नमक और वसा की अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है, तो उपभोक्ताओं को स्पष्ट चेतावनी देने में देरी क्यों हो रही है। अदालत ने बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता जाहिर की।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और FSSAI को अपने अंतिम रुख पर दो सप्ताह के भीतर स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि सरकार और नियामक स्पष्ट निर्णय नहीं लेते हैं, तो न्यायालय इस मामले में आगे आदेश दे सकता है।

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